#37: समर्टन का अजनबी
एडिलेड के समुद्र किनारे मिली एक लाश ने 74 साल तक पूरी दुनिया को उलझाए रखा
1 दिसंबर 1948 की भोर। ऑस्ट्रेलिया के एडिलेड शहर से ग्यारह किलोमीटर दूर, समर्टन पार्क समुद्र तट पर एक जोड़ा टहल रहा था। सर्द हवाओं के बीच समंदर की लहरें किनारे से टकराकर वापस लौट रही थीं। तभी उन्हें रेत पर एक आदमी दिखा। सूट पहने, समुद्र की दीवार से पीठ टिकाए, पाँव आराम से फैलाए, टाँगें एक-दूसरे पर क्रॉस की हुईं। लगा जैसे बस झपकी ले रहा हो।
लेकिन वो मृत था।
पुलिस आई। जेबें खंगाली गईं। जो मिला वो उतना ही रहस्यमय था जितना वो आदमी खुद। एक अप्रयुक्त रेल टिकट, एक बस टिकट, च्युइंगम का आधा पैकेट, एक कंघी, और एक सिगरेट के डिब्बे में अलग किस्म की सात सिगरेटें। बटुआ नहीं, पहचान पत्र नहीं, कोई चिट्ठी नहीं।
और सबसे अजीब बात यह थी कि उसके कपड़ों से एक-एक करके सभी निशान कैंची से काट दिए गए थे। जानबूझकर, सफाई से, बिना एक धागा छोड़े। वो आदमी जैसे दुनिया को चुनौती देना चाहता था कि पहचानो, अगर पहचान सको।
मृत्यु परीक्षण की रिपोर्ट से रहस्य और गहरा गया। आदमी चालीस से पैंतालीस साल का था, पाँच फुट ग्यारह इंच लंबा, चौड़े कंधे, हाथों पर मेहनत का कोई निशान नहीं। शरीर में कोई बीमारी नहीं, कोई चोट नहीं। भीतरी अंग बताते थे कि ज़हर था, लेकिन कौन सा ज़हर था यह जाँच में खोजा न जा सका। डॉक्टर ने लिखा कि मौत स्वाभाविक नहीं थी, मगर उससे आगे वो कुछ नहीं कह सके।
जनवरी 1949 में रेलवे स्टेशन के सामान घर में एक भूरा बक्सा मिला, उसका भी पहचान-लेबल हटाया हुआ था। अंदर मिला एक पेचकस, एक तेज़धार चाकू, नुकीली कैंची, और एक ऐसा ब्रश जो माल-जहाजों पर सामान की पहचान के लिए निशान लगाने में काम आता है। साथ में एक दुर्लभ किस्म का मोमी धागा था जो ऑस्ट्रेलिया में मिलता ही नहीं था, और जो उसी तरह का था जिससे उसकी पतलून की जेब की मरम्मत की गई थी।
उस बक्से में एक और सुराग था जो बाद में सबसे अहम निकला। एक दुर्लभ संस्करण की किताब के धागे, जो ऑस्ट्रेलिया में छपी ही नहीं थी।
जून 1949 में, जब जाँच चल रही थी, तब उस मृत आदमी की पतलून की एक छुपी हुई जेब में कागज़ का एक छोटा टुकड़ा मिला। उस पर दो शब्द छपे थे, “Tamám Shud” फारसी भाषा में इसका अर्थ है, यह सब खत्म हो गया। वो टुकड़ा उमर खय्याम की रुबाइयात नामक काव्य-संग्रह के अंतिम पृष्ठ से फाड़ा गया था। वही किताब जो यह कहती है कि जीवन भरपूर जियो ताकि जब अंत आए तो कोई पछतावा न हो।
पुलिस ने उस किताब को ढूँढ निकाला। उसके पिछले कवर पर बहुत हल्के दबाव से लिखे कुछ अक्षर थे जो केवल पराबैंगनी प्रकाश में दिखते थे। पाँच पंक्तियाँ थीं, बड़े अक्षरों में। दूसरी पंक्ति काटी हुई थी। न शब्द, न वाक्य, सिर्फ अक्षरों की माला।
सरकारी गुप्तचर आए, सेना के विशेषज्ञ आए, बाद में अमेरिकी जाँच संस्था और स्कॉटलैंड यार्ड ने भी कोशिश की। कोई उस संदेश को नहीं पढ़ पाया। वो संकेत-लिपि आज तक नहीं टूटी।
उसी किताब में एक और चीज़ मिली, एक दूरभाष क्रमांक। जब पुलिस ने उसे ढूँढा तो वो नंबर उस समुद्र तट से केवल चार सौ मीटर दूर रहने वाली एक महिला का था। नाम था जेसिका एलन थॉमसन, एक परिचारिका। पुलिस उससे मिली। उसने कहा कि वो उस मृत आदमी को नहीं जानती।
लेकिन जब पुलिस उसे उस आदमी का प्लास्टर का बना चेहरा दिखाने ले गई, तो जो हुआ उसने जाँच अधिकारी को भी हिला दिया। जेसिका ने चेहरा देखा और लगभग बेहोश हो गई।
जेसिका ने पुलिस को बताया कि उसने एक बार उमर खय्याम की उसी किताब की एक प्रति एक फौजी अधिकारी को दी थी, जिसका नाम ऑल्फ बॉक्सॉल था। पुलिस को लगा कि शायद बॉक्सॉल ही वो मृत आदमी है। लेकिन बॉक्सॉल सिडनी में जीवित और ठीक-ठाक पाया गया। उसके पास वही किताब थी, “Tamám Shud” का पृष्ठ अभी भी सुरक्षित था, फाड़ा नहीं गया था।
तो वो किताब कहाँ से आई? किसने फाड़ी? और क्यों?
जेसिका ने 1949 में पुलिस से अनुरोध किया कि उसका नाम किसी भी सरकारी दस्तावेज़ में न आए। पुलिस मान गई, और इसी निर्णय ने आने वाले दशकों की जाँच को बाधित कर दिया। उसका असली नाम 2002 तक गुप्त रहा। जब एक सेवानिवृत्त जाँच अधिकारी ने 2002 में उससे मिलकर बात की, तो उन्हें लगा कि वो या तो टाल रही है या फिर सच बताना नहीं चाहती। जेसिका 2007 में चल बसीं, अपना राज़ अपने साथ लेकर।
उनकी बेटी केट ने 2014 में एक टीवी कार्यक्रम में कहा कि उसकी माँ ने उसे बताया था कि उसने पुलिस से झूठ बोला था। वो उस आदमी को जानती थी।
1948 वो दौर था जब शीत युद्ध की शुरुआत हो रही थी। एडिलेड से ज़्यादा दूर नहीं, एक युरेनियम की खान थी और एक गुप्त सैन्य परीक्षण केंद्र था जिस पर रूसी जासूसों की नज़र थी। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि उनका मानना था कि वो आदमी किसी पूर्वी यूरोपीय देश से था। जेसिका रूसी बोलती थी, साम्यवाद में रुचि रखती थी, और बॉक्सॉल युद्ध के दौरान गुप्तचर इकाई में काम कर चुका था। तार जुड़ते दिखते थे, लेकिन कोई गाँठ नहीं बनती थी।
2021 में अधिकारियों ने उस मृत आदमी की क़ब्र खोदी। उसके बालों के नमूने पहले ही एक प्लास्टर के मुखौटे से मिले थे। प्रोफेसर डेरेक एबॉट और एक वंशावली विशेषज्ञ ने आनुवंशिक जाँच की और 26 जुलाई 2022 को घोषणा की कि वो आदमी 1905 में जन्मा कार्ल वेब था, मेलबर्न का एक विद्युत अभियंता।

कार्ल वेब की कहानी किसी जासूसी कथा जैसी नहीं, बल्कि एक साधारण इंसान के विषाद की कहानी निकली। उसने 1941 में डोरोथी रॉबर्टसन से विवाह किया था, एक औषधि विशेषज्ञ से। शादी कामयाब न रही। डोरोथी ने बताया कि कार्ल एकाकी था, मूडी था, कभी-कभी हिंसक हो जाता था। वो कविताएँ लिखता था, अधिकतर मौत के विषय पर। 1946 में उसने ईथर की अधिक मात्रा लेकर जीवन समाप्त करने की कोशिश की थी, तब डोरोथी ने उसे बचाया। 1947 में डोरोथी उसे छोड़ चली गई। कार्ल भी गायब हो गया। किसी को नहीं पता था वो कहाँ गया।
प्रो.एबॉट का अनुमान है कि कार्ल शायद डोरोथी को ढूँढने एडिलेड आया था, जो 1951 में एडिलेड से 144 किलोमीटर दूर एक कस्बे में रह रही थी। और जब उसे कुछ नहीं मिला, तो उसने वही किया जो उसकी कविताओं में बयाँ रहती थीं।
दक्षिण ऑस्ट्रेलिया पुलिस ने एबॉट की खोज की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं की है। यह पाया गया था कि जेसिका थॉमसन के बेटे रॉबिन की, जो 1947 में पैदा हुआ था, कान की बनावट और दाँतों की आनुवंशिक विशेषता उस मृत आदमी से हूबहू मेल खाती थी।
क्या कार्ल वेब रॉबिन का असली पिता था? क्या जेसिका इसीलिए ज़िंदगी भर चुप रही? अगर मृतक एक साधारण इंजीनियर था, तो वह कोड क्या था? और उसने अपनी पहचान के सारे निशान क्यों मिटा दिए थे? शायद इन सब सवालों के जवाब जेसिका और कार्ल के साथ ही दफ़न हो गये।




