#36: AI पॉडकास्ट्स बनाम इंसानी आवाज़: क्या मशीनें भावनाओं की जंग हार रही हैं?
साथ ही: 2025 के शीर्ष 10 पॉडकास्ट
जनरेटिव AI की दुनिया में क्रांति के बीच, पॉडकास्टिंग और रेडियो भी इसके प्रयोगों से अछूता नहीं रहा। कुछ विशेषज्ञ दावा करते हैं कि भविष्य में मानव होस्ट की जरूरत ही खत्म हो जाएगी। लेकिन न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी (NYU) के एक ताजा प्रयोग ने इस धारणा को चुनौती दी है।
NYU के ‘इमर्सिव स्टोरीटेलिंग’ पाठ्यक्रम के छात्रों को Inception Point AI कंपनी द्वारा बनााए गए पॉडकास्ट सुनााए गए। अगर आपने ये माध्यम हाल में प्रयोग किये हैं तो मानेंगे कि अब ये तकनलाजी कोई सामान्य टेक्स्ट-टू-स्पीच नहीं रही, ये कृत्रिम मीडिया का नया शाहकार है। लेकिन नतीजे चौंकाने वाले रहे – छात्रों ने इन पॉडकास्ट्स को महज 2.3/5 रेटिंग दी।
दरअसल समस्या कोडिंग की नहीं, ‘कनेक्शन’ की है। एक जेन-जी छात्र का कहना था कि AI की आवाज़ में वह कच्चापन और असुरक्षा (vulnerability) नहीं थी, जो इंसानी संवाद को प्रामाणिक बनाती है। “यह ऐसा था जैसे कोई रोबोट मुझे निर्देश दे रहा हो कि मुझे कैसा महसूस करना चाहिए, जबकि वह खुद कुछ महसूस नहीं कर सकता।”
“कोई रोबोट मुझे निर्देश दे रहा है कि मुझे कैसा महसूस करना चाहिए,
जबकि वह खुद कुछ महसूस नहीं कर सकता”
यह रिपोर्ट एक कड़वा सच उजागर करती है: AI आवाजें ‘’उपयोगिता” के क्षेत्र में तो अव्वल हैं, लेकिन “आत्मीयता” के मामले में फेल। AI आवाज़ें 'कुत्ते को ट्रेन करने' जैसे फैक्ट-बेस्ड कंटेंट में तो कारगर थीं, लेकिन स्टोरीटेलिंग में असफल रहीं। श्रोताओं ने मानवीय गुणों जैसे "सांस लेने की आवाज़" और "शब्दों के बीच के सन्नाटे" की कमी महसूस की।
जैसे-जैसे AI इंसानी आवाज़ के करीब पहुँचता है, वह और ज़्यादा अजीब लगने लगता है। NYU के छात्रों ने इसी ‘क्रीपिनेस’ को महसूस किया। रोबोटिक्स विशेषज्ञ मासाहिरो मोरी ने इस अजीब, असहज भावना को नाम दिया है अनकैनी वैली, जिसमें हमें लगभग इंसानों जैसी दिखने या काम करने वाली किसी आर्टिफिशियल चीज़ (जैसे रोबोट, डिजिटल अवतार, या चैटबॉट) की शक्ल या हरकत पसंद आने के बजाय उससे नफ़रत हो जाती है।
अगर आप एक पॉडकास्टर हैं और सोच रहे हैं कि अपना माइक बेचकर अपनी आवाज़ का AI क्लोन बनवा लें, तो रुकिए। कृत्रिम आवाज़ें विश्वसनीयता का संकट पैदा करती हैं। अगर आवाज़ नकली है, तो क्या सामग्री भी नकली है? श्रोता का यह संदेह आपके ब्रांड को खत्म कर सकता है।
AI का उपयोग ट्रांसक्रिप्शन, एडिटिंग या डबिंग के लिए करें, लेकिन अपनी ‘पहचान’ को आउटसोर्स न करें। पॉडकास्टिंग एक “आत्मीय माध्यम” है, जहां श्रोता होस्ट के साथ भावनात्मक रिश्ता बनाते हैं। NYU का प्रयोग साबित करता है कि AI अभी इस मानवीय गुणवत्ता की नकल नहीं कर सकता। तकनीक एक औजार बन सकती है, लेकिन इंसानी कनेक्शन का विकल्प नहीं।
2025 के शीर्ष 10 पॉडकास्ट
स्पाटिफाई ने के शीर्ष 10 पॉडकास्ट की सूची जारी की है। जो रोगन पुनः अव्वल नंबर पर हैं।
स्पाटिफाई के मुताबिक 2025 में भारत के पॉडकास्ट परिदृश्य में लोकल क्रिएटर्स की तरफ बड़ा झुकाव देखा गया। “फिगरिंग आउट विद राज शमानी” भारत का नंबर-वन पॉडकास्ट चुना गया है, जो उद्यमशीलता और सांस्कृतिक विषयों से जुड़ी बातचीत के प्रति लोगों की पसंद को दिखाता है। भारतीय डेटा की कवरेज में बताया गया है कि दर्शक ऐसी भारतीय आवाज़ों को चुन रहे हैं जो उनकी आकांक्षाओं, करियर और रोज़मर्रा की ज़िंदगी की सच्चाइयों से जुड़ती हैं।





